जीने का मज़ा लूट लेंगे ज़िन्दगी !

जितना सताएगी तू ज़िन्दगी
उतना ही प्यार करेंगे ज़िन्दगी
सितम हर तरह के तू ढायेगी
तब्बसुम से सेह लेंगे ज़िन्दगी
कठिनाईयाँ तो कई आएँगी
उतना ही कायल हमें पायेगी
हर घूँट में कड़वाहट भरी होगी
ज़हर पीने में मज़ा तभी आएगी
जितना हमें तू रोज़ तड़पायेगी
जीने का मज़ा लूट लेंगे ज़िन्दगी
कौन जीता है जीने के लिए ज़िन्दगी
तुझे झेलकर देखना है, क्या है ज़िन्दगी !

~ फ़िज़ा

#happypoetrymonth
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ऐ ‘फ़िज़ा’ चल दूर ही चलें कहीं !

इस जहाँ में कोई किसी का नहीं
पता है तब क्यों आस छोड़ते नहीं

नकारना ही है हर तरह जहाँ कहीं
गिरते हैं क्यों इनके पाँव पर वहीं

कोशिशें लाख करो सहानुभूति नहीं
क्यों इनकी मिन्नतें करते थकते नहीं

मोह-माया से अभी हुए विरक्त नहीं
बंधनों से अपेक्षा भी कुछ हुए कम नहीं

बंधनों को छुटकारा दिला दें कहीं
वक्त आगया है बुलावा आता नहीं

ऐ ‘फ़िज़ा’ चल दूर ही चलें कहीं
प्यार न सही नफरत करें भी नहीं !

~ फ़िज़ा

#happypoetrymonth

वक्त बे वक्त, वक्त निकल चूका !

वक्त बे वक्त, वक्त निकल चूका

सोचता हूँ मैं किधर जा चूका?

समय का क्या है चलता ही रहा
मुझे साथ क्यों लेकर चलता रहा?

जाना है वर्त्तमान से भविष्य की ओर
मुझे क्यों नहीं छोड़ दिया भूतकाल में?

वक्त भी बड़ा अजीब खिलाडी है
खेलते-खेलते हमें संग क्यों ले गया?

क्या कहें वक्त-वक्त की बात है
आजकल हमारा वक्त ही खराब है!

~ फ़िज़ा

#happypoetrymonth

मेरा हर गुनाह अक्षम्य है!

मुझे सब तोहमतें मंज़ूर हैं,
मेरा हर गुनाह अक्षम्य है,
मेरा अस्तित्व ही भ्रष्ट है,
मुझे मेरी हर सज़ा मंज़ूर है,
मुझे मार दो या काट दो,
मुझे हर रेहम मंज़ूर है,
यूँ जीना इस तरह मेरा,
कम नहीं किसी दंड से,
मौत मेरे लिए है रेहम,
पता है न मिलेगी वो मुझे,
किये हैं जो दुष्कर्म मैंने,
जाएगी मेरे संग रहने,
खुद को न यूँ सज़ा दो,
ये बहुत कठिन मेरे लिए,
रेहम करो ज़िन्दगी पर,
जुड़े हैं ज़िंदगानी तुम पर,
ख़ुशी से सींच लो तुम,
जीवन अपना संवारकर !
~ फ़िज़ा

#happypoetrymonth

दर्द होता है सीने में मेरे भी मगर …!

 

तड़पता है दिल किसी को देख के
कोई माने या न माने दुख होता है !

कभी चाहा नहीं जानकार क्रूरता
अनजाने में ही ग़लती हो जाती है !

दर्द होता है सीने में मेरे भी मगर
कैसे इज़हार करूँ जब मानोगे नहीं !

किसे सज़ा दे रहे हो ये जानते नहीं
प्यार करते हैं तभी तो दुखता है दिल !

क्यों बैर द्वेष से जीना है ज़िन्दगी
जब कुछ पल की ही है ज़िन्दगी !

जो कहो करने के लिए है तैयार फ़िज़ा
सब छोड़कर बस हुकुम तो करो ज़रा !

~ फ़िज़ा

#happypoetrymonth

शर्मसार दुर्भाग्य

अमानवीय क्रूर जघन्य
लाचार मायूस मनहूस
बेबाक शर्मनाक खूंखार
सर्वनाश हिंसक हैवान
बलात्कारी जानवर
अन्याय असहनीय
शर्मसार दुर्भाग्य
बेटी माता-पिता
मजबूर इंसान
~ फ़िज़ा
#happypoetrymonth

नारी जाती का कोई सम्मान नहीं है!

किताबों में पढ़ा था
ऐसा भी एक ज़माना था
औरत से ही जीवन चलता
और घर भी संभलता था !
फिर एक ज़माना वो भी आया
नारी शक्ति, नारी सम्मान
का एक चलन ऐसा भी आया
ऊँचा दर्ज़ा और सम्मान दिया !
फिर भी नारी का ये हाल रहा
“अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध, आँखों में पानी”
हाड-मांस की वस्तु बनी नारी!
फिर ये भी ज़माना आया
एक समान एक इंसान का नारा आया
जवान-बूढ़े-बच्चे सभी एक समान
फिर बलात्कार क्यों स्त्री पर ढाया?
मेहनत औरत भी करे, जिम्मेदारी भी ले
औरत कंधे से कन्धा मिलाकर चले
बस एक ही वजह से वो शिकार बने
दरिंदे औरत को हवस की नज़र से देखे !
पढ़ा है बन्दर से इंसान बना पर
बन्दर हमसे अक्कलमंद निकला
बोलना नहीं सीखा तो क्या हुआ
प्यार-मोहब्बत का इज्ज़्हार तो आया !
इंसान अपनी बुद्धि से मात खाया
अपने ही लोगों को समझ न पाया
औरत को समझने का भाग्य न पाया
बन्दर से इंसान दरिंदे का सफर पाया!
किसको दोश दें ऐसा वक़्त आया
बलात्कारी या उसको आश्रय देने वाला
गुनहगारों को सज़ा दें तो क्या दें
हर शहर हर गली की कहानी है !
“अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
आँचल में है दूध, आँखों में पानी”
मैथिलि जी का लिखा आज भी सही है
नारी जाती का कोई सम्मान नहीं है!
~ फ़िज़ा